अजीत डोभाल : इनके नाम से क्यों दुश्मन खाता है खोफ?, शेर दिल पहाड़ी के 10 कारनामे पढ़ कर जान जाओगे

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Dobhal

जैसे कि नाम से ही ज्ञात होता है अजीत जिसे कोई नहीं जीत नहीं सकता ये रियल दुनिया के जेम्स बांड कहलाते हैं और ऐसे वीर और शेर दिल इंसान का नाता है देवभूमि उत्तराखंड से तो सबसे पहले ये जानते हैं कि अजीत डोभाल उत्तराखंड में कहां पैदा हुए और उन्होंने जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए क्या क्या कार्य किये फिर हम उनके विराट व्यक्तित्व की चर्चा करेंगे-

कुमार डोभाल का जन्म 20 जनवरी, 1945 में पौडी गढ़वाल (उत्तराखण्ड) के घीडी बानेलेस्यूं में हुआ। एक गढ़वाली परिवार में जन्म लेने वाले डोभाल ने अपने प्रारम्भिक शिक्षा अजमेर (राजस्थान) के मिलिट्री स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद कॉलेज की शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन्होंने आगरा विश्व विद्यालय को चुना और यहीं से डोभाल ने अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल की और अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढाई पूरी करने के उपरान्त उन्होंने आई.पी.एस. ऑफिसर बनने के लिये तैयारी शुरू कर दी।

आख़िरकार उनकी मेहनत रंग लाई और 23 साल की उम्र में 1968 में केरल कैडर से अजीत डोभाल भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी के रूप में चुने गए। यहां 37 साल अपनी सेवाएं देने के बाद 2005 रिटायर्ड हुए। 2014 में वे शिव शंकर मेनन के स्थान पर भारत के पांचवे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने। अब उनके कुछ कार्यों महान कार्यों पर नजर दौडाते हैं-

1. उरी में हुए आतंकी हमले के दिन ही पाकिस्तान को इस घटना का माकूल जवाब देने की रणनीति अजीत डोभाल ने ही बनायी थी। प्रधानमंत्री मोदी से हरी झंडी मिलते ही भारत ने वो कर दिखाया जिसके बारे में पाकिस्तान ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। भारत ने बिना वायुसेना की मदद लिए POK में MI-17 हेलीकॉप्टरों द्वारा ऑपरेशन को अंजाम दिया और दहशतगर्दों के बहुत से लोंचिंग पेड नष्ट कर दिए। इस ऑपरेशन में 38 से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया और इस दौरान भारतीय सैनिकों ने अनेक आतंकी शिविर तबाह कर दिए।

2. अजीत डोभाल यह अच्छी तरह से जानते थे कि आतंकियों का पाक और अफगानिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश करना सहज नहीं है इसलिए वे नेपाल अथवा बांग्लादेश होकर भारत में प्रवेश करेंगे और उन्होंने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए इन दोनों देशों से आने वाले लोगों की जाँच प्रक्रिया इतनी जटिल कर दी कि आतंकियों का इन देशों से रस्ते भी भारत में आना दुष्कर हो गया।

3. अजीत डोभाल अपने आई.पी.एस. करियर के दौरान 7 साल तक पाकिस्तान में भारत के अंडर कवर जासूस के रूप में काम कर अनेक ख़ुफ़िया सूचनाएं भारत पहुंचाते रहे ये कोई बच्चों का खेल नहीं है याद रखिये ऐसा शेर दिल ही कर सकता है।

4. क्या आपको कांधार में IC-814 का अपहरण याद है? इस पूरे प्रकरण में 147 अपहृत लोगों को सुरक्षित वापस बुलाने में उनकी अहम भूमिका थी – सन् 1971 से 1999 के बीच वे 15 ऐसे अपहरण के मामले सुलझा चुके हैं।

5. वे सबसे कम उम्र के पुलिस अफ़सर हैं जिन्हें विशेष सेवा के लिए पुलिस मेडल मिला था। उन्हें इस तमगे को हासिल करने में सिर्फ़ 6 साल लगे। उनके कई कारनामे तो ऐसे भी हैं जिनका राज सुरक्षा लिहाजों से नहीं खोला जाता है।

6. प्रधानमंत्री मोदी ने अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर नियुक्त होने के बाद ISIS की बंधक बनाई गई 46 नर्सों सुरक्षित भारत वापस लाने की जिम्मेदारी सौंपी। अजीत डोभाल ने अपनी कुशाग्र बुद्धि और समझ से ISIS के लोगों को इस प्रकार से शीशे में उतारा कि आख़िरकार उन्होंने सभी बंधक बनी 46 नर्सों को रिहा कर दिया और उनकी सकुशल भारत वापसी संभव हो सकी।

7. सन् 1986 में वे मिजोरम में फिल्ड एजेंट की भूमिका में थे। वहां उन्होंने मिजो नेशन फ्रंट बना कर भारत सरकार के खिलाफ़ हथियार उठा चुके लड़ाकों को समझा-बुझा कर और बल पूर्वक हथियार छोड़ने हेतु मना लिया। उन्होंने मिजो फाइटर्स को शांति मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया – इस पूरे प्रकरण और भारतीय राज्य मशीनरी के घुसपैठ से मिजो फाइटर्स का मनोबल टूट गया, और इस प्रकार 20 सालों से चली आ रही अंतर्कलह व विरोध का अंत हो गया।

8. सन् 80 के दशकों में वे बतौर पाकिस्तान एजेंट, अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में दाखिल हुए थे और खालिस्तान के लिए लड़ रहे लड़ाकों से अहम जानकारियां बाहर ले आए थे – कहा जाता है कि वे एक रिक्शा चालक के वेश में वहां दाखिल हुए थे। ओपरेशन ब्लैक थंडर ने विद्रोहियों को आत्मसमर्पण पर मजबूर कर दिया था।

9. अजीत न सिर्फ़ एक बेहतरीन खूफ़िया जासूस हैं बल्कि एक बढ़िया रणनीतिकार भी हैं। वे कश्मीरी अलगाववादियों जैसे यासिन मलिक, शब्बीर शाह के बीच भी उतने ही विख्यात हैं जितना भारत के आला अफ़सरों के बीच अगर उन्हें एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

10. उन्होंने कश्मीर के विरोधी ‘कूका परे’ और उसके साथी लड़ाकों को प्रतिवादी ताकत बनने के लिए मना लिया। इसकी वजह से जम्मू कश्मीर में 1996 से चुनाव हो रहे हैं। देश में शांति के दौरान दिये जाने वाले प्रशस्ति तमगे कीर्ति चक्र से भी उन्हें नवाज़ा जा चुका है।

कितनी ही अनगिनित खूबियाँ हैं जिनकी जिक्र हम आगे भी करते रहेंगे इस पहाड़ी में दम तो है इसलिए चीन ने भी अजीत डोभाल को सबसे खतरनाक बताया क्योंकि वो अडिग और देशहित वाला फैसला लेते हैं देशहित के लिए जो सही ना हो उसे वो दरकिनार कर देते हैं इसलिए प्रधानमंत्री मोदी हर सुरक्षा और विदेश नीतियों को लेकर अजीत डोभाल की राय लिए बिना आगे नहीं बढ़ते।

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